Sunday, October 7, 2012

भारतीय महिलाओं में दिल का दौरा पडऩे का खतरा ज्यादा होता है Heart Attack


लोगों के बीच एक बड़ा मिथक प्रचलित है कि दिल की बीमारियों के शिकार सिर्फ पुरुष ही होते हैं। पिछले कुछ साल से महिलाओं में दिल की बीमारियों के मामले जिस तेजी से बढ़े हैं, उससे यह मिथक पूरी तरह टूट गया है।
पिछले कुछ अध्ययनों के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में हर साल दिल की बीमारियों से 86 लाख महिलाओं की मौत हो जाती है। यह संख्या महिलाओं की कुल मौत का एक तिहाई हिस्सा है। सिर्फ दिल के दौरे से ही दुनिया भर में 2,67,000 महिलाओं की मौत हो जाती है और यह तादाद स्तन कैंसर से मरने वाली महिलाओं की संख्या से छह गुना ज्यादा है। भारत में महिलाओं में हृदय संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। देश में महिलाओं की मौत में इन बीमारियों की हिस्सेदारी 17 फीसदी तक पहुंच गई है।
तेजी से बदलती जीवनशैली, पश्चिमी शैली का खान-पान, दफ्तर और घर में बढ़ते तनाव स्तर महिलाएं दिल की बीमारियों का ज्यादा शिकार हो रही हैं।
हाई ब्लडप्रेश, हाई कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज, मेनोपॉज, मेटाबोलिक सिंड्रोम महिलाओं में इस बीमारी को बढ़ावा देते हैं। शारीरिक मेहनत से दूर जीवनशैली, गर्भनिरोधक दवाओं के  इस्तेमाल और एस्ट्रोजन लेवल का कम होना भी महिलाओं में दिल की बीमारियों को न्योता देता है। स्मोकिंग और ड्रिकिंग महिलाओं में दिल की बीमारियों की बड़ी वजह हैं।
जो महिलाएं स्मोकिंग करती हैं, उनमें पुरुषों की तुलना में दिल की दौरा पडऩे की आशंका 19 गुना ज्यादा होती है। हाईब्लडप्रेशर या हाइपरटेंशन की शिकार महिलाओं को पुरुषों की तुलना में दिल का मरीज होने की आशंका 3.5 गुना ज्यादा होती है। जो महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियां लेती हैं उनमें यह खतरा ज्यादा होती है। खास कर उन महिलाओं में जिनका वजन ज्यादा होता है।
दिल की बीमरियों के लक्षण पुरुषों और महिलाओं में एक जैसे नहीं होते। जैसा कि पुरुषों में होता है, महिलाओं में दिल का दौरा पडऩे से पहले छाती में बहुत ज्यादा दर्द नहीं होता और न ही उनके बाएं हाथ में यह शिकायत होती है। महिलाओं में थकावट और कमजोरी, सांस लेने में तकलीफ, उल्टी या चक्कर आना, चिंता, सिर घूमने और नींद में गड़बड़ी जैसी शिकायतें दिल के दौरे का पूर्व संकेत हो सकती हैं।
अपच, दर्द, जबड़े, गर्दन, बांह या कान तक पहुंचने वाली जकडऩ इसके लक्षण हो सकती है। लगातार रहने वाला सिरदर्द भी एक लक्षण हो सकता है।
30 से 40 साल की महिलाओं में अचानक  दिल का दौरा पडऩे का खतरा ज्यादा होता है क्योंकि इस उम्र में महिलाएं में गर्भ निरोधक गोलियों के सेवन करती हैं। मोटापा, हाई कोलेस्ट्रॉ़ल और मीनोपॉज का एक साथ होना मारक होता है। चूंकि महिलाएं मासिक धर्म, गर्भधारण और प्रसूति से जुड़े दर्द को सहने की आदत विकसित कर लेती हैं। इसलिए वह शरीर में होने वाले दर्द को हल्के में लेने लगती हैं। यह स्थिति खतरनाक है। कई मामलों में यह दिल के दौरे का संकेत देते हैं। 65 साल से ज्यादा उम्र वाली महिलाओं में दिल का दौरा पडऩे का खतरा ज्यादा होता है और हो सकता है कि उनमें इसके लक्षण भी न दिखाई देते हों। जिन महिलाओं में मीनोपॉज हो चुका होता है उन्हें भी हृदय संबंधी बीमारियां होने का खतरा सामान्य महिलाओं से दो या तीन गुना ज्यादा होता है।
शुरुआती दौर में दिल की बीमारियां दवाओं से ठीक हो जाती हैं लेकिन एडवांस स्टेज में सर्जरी की मदद लेनी पड़ती है। बीमारी के एडवांस स्टेज से ग्रसित महिलाओं के दिल की बाइपास सर्जरी या एंजियोप्लास्टी करनी पड़ती है। उन्हें आर्टिफिशियल हार्ट वाल्व या पेसमेकर लगाना पड़ सकता है। भारतीय महिलाओं की हृदय धमनियां पुरुषों की तुलना में संकरी होती है। इसलिए महिलाओं में दिल का दौरा पडऩे का खतरा ज्यादा होता है।
बहरहाल, कुछ सरल उपायों से हृदय संबंधी बीमारियों की रोकथाम में मदद मिल सकती है। अगर महिलाएं स्मोकिंग करती हैं तो इसे तुरंत बंद कर देना चाहिए। इसमें निकोटिन होता है यह दिल के लिए बहुत नुकसानदेह होती है। खान-पान का ध्यान रखकर दिल की बीमारियों से निजात पाई जा है। तले-भूने खाने में मौजूद ट्रांस फैट एसिड शरीर में बुरे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ा देता और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को घटा देता है। इससे दिल पर बुरा असर पड़ता है। नियमित व्यायाम से दिल को स्वस्थ रखा जा सकता है। हर दिन सुबह-शाम आधे घंटे का नियमित व्यायाम हृदय संबंधी बीमारियों को दूर रख सकता है। योग और ध्यान जैसी शारीरिक-मानसिक क्रियाएं इन्हें दूर रखती हैं। भारत में हर साल हृदय धमनी संबंधी बीमरियों से 25 से 30 लाख लोगों की मौत हो जाती है और इनमें महिलाओं की तादाद बढ़ती जा रही है। इसलिए समय रहते इन बीमारियों से बचने और इनके बारे में जागरुकता फैलाने के कदम उठाए जाने चाहिए।
http://www.aparajita.org/read_more.php?id=895&position=1&day=1

Tuesday, September 18, 2012

औरत की काया को ताउम्र सुंदर, सुडौल व स्वस्थ बनाए रखने के लिये सुंदर आयुर्वेदिक नुस्खा Sudol


मातृशक्ति के शरीर को ताउम्र सुंदर, सुडौल व स्वस्थ बनाए रखने के लिये सुंदर आयुर्वेदिक नुस्खा :-
महिलाएँ प्रायः स्वभाव से ही भावुक होती हैं. ममता, प्यार, दया और सेवाभाव, ये सभी गुण उनमें जन्म से ही होते हैं. यही वे गुण हैं जिनके कारण 'मातृशक्ति' शादी के बंधन में बंधने के बाद पराए घर को भी अपनाकर स्वयं को दिन-रात उस परिवार की सेवा में लगा देती है. ऐसे में अधिकतर महिलाएँ अपने ऊपर ध्यान नहीं दे पाती हैं. ध्यान नहीं देने के कारण वे कई बार अपनी बीमारियों को छिपाए रखती हैं. इस तरह अंदर ही अंदर वे कमजोर होती जाती हैं. श्वेत-प्रदर, रक्त प्रदर, मासिक धर्म की अनियमितता, कमजोरी, सिरदर्द, कमरदर्द आदि ये सभी बीमारियाँ शरीर को स्वस्थ और सुडौल नहीं रहने देती हैं.
इसलिए हम आपको ''स्वर्ण मालिनी'' वसंत नामक एक ऐसा आयुर्वेदिक नुस्खा बताने जा रहे हैं जो महिलाओं की हर तरह की कमजोरी को दूर करता है.
(अ) ''स्वर्ण मालिनी'' वसंत बनाने हेतु आवश्यक आयुर्वेदिक सामग्री :- 
१/ स्वर्ण भस्म या वर्क = 10 ग्राम
२/ मोती पिष्टी = 20 ग्राम
३/ शुद्ध हिंगुल = 30 ग्राम
४/ सफेद मिर्च = 40 ग्राम
५/ शुद्ध खर्पर = 80 ग्राम
६/ गाय के दूध का मक्खन = 25 ग्राम
7/ थोड़ा सा नींबू का रस.

(ब) बनाने की विधि :- 
पहले स्वर्ण भस्म या वर्क और हिंगुल को मिला कर एक जान कर लें. फिर शेष द्रव्य मिलाकर मक्खन के साथ अच्छी तरह घुटाई करें. अब नींबू का रस कपड़े की चार तह करके छान कर इसमें मिलायें. अब इसकी आठ-दस दिन तक नियमित रूप से इतनी घुटायी करें कि इसका चिकनापन पूरी तरह दूर हो जावे. अब इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें.
(स) सेवन की विधि :- 
1 या 2 गोली सुबह शाम एक चम्मच च्यवनप्राश के साथ सेवन करें.
(द) ''स्वर्ण मालिनी'' वसंत के लाभ एवं उपलब्धता :-
इस दवाई का सेवन करने से महिलाओं को प्रदर रोग, शारीरिक क्षीणता व हर प्रकार की कमजोरी से मुक्ति मिलती है और शरीर स्वस्थ और सुडौल बनता है. इसके सेवन से शरीर के सभी अंगों को ताकत मिलती है व शरीर बलशाली बनता है. यह दवाई ''स्वर्ण मालिनी'' वसंत के नाम से ही बाजार में भी मिलती है.
फ़ेसबुक से साभार

Saturday, September 15, 2012

ऐसे बनाएं खुद को मजबूत

यदि आप अक्सर शंकाओं में घिरी रहती हैं, कोई भी निर्णय लेने से हिचकिचाती हैं या फिर खुद पर भी भरोसा नहीं कर पाने के कारण कोई नई पहल नहीं कर पातीं, तो इसका मतलब है आपको खुद को मजबूत बनाने की जरूरत है। कैसे? आइये जानें..
आप होम मेकर हैं या फिर नौकरी पेशा महिला, चुनौतियों से दो-चार होना ही पड़ता है। कई पल ऐसे भी आते हैं, जब खुद से ही विश्वास डगमगाने लगता है। ऐसे में जरूरत होती है कुछ ऐसे बदलावों की, जो आपको भीतर तक मजबूत बनाएं, साथ ही आपको अलग पहचान दिलाने में भी मदद करें।  
1. खुद पर करें विश्वास: कैसी भी स्थिति क्यों न हो, यह विश्वास बनाए रखें कि आप इसका सामना कर सकती हैं। हमेशा ध्यान रखें कि आप  खुद के बारे में जितना सोचती हैं, उससे कहीं अधिक काम करने में सक्षम हैं।   
2. प्रश्न पूछें: पहले से यदि कुछ होता रहा है तो यह जरूरी नहीं कि वह सही भी हो या फिर आपके लिए भी उसकी उतनी ही उपयोगिता हो। सच्चाई तो यह है कि हमारी अधिकतर सीमाएं खुद की बनाई होती हैं। पहले से अपने मन में धारणाएं बनाकर रखना संभावनाओं को खत्म कर देता है। 
3. करें वही, जो हो सही: किसी भी चीज या अच्छाई-बुराई से बड़ी बात यह है कि आप खुद के प्रति ईमानदार रहें। फिर भले ही यह रास्ता मुश्किल ही क्यों न हो। हो सकता है कि कुछ बातें आपकी लोगों को बुरी लग सकती हैं, पर यदि आप सही हैं तो पूरा परिवार या सहकर्मी जल्द ही आपकी बात को स्वीकार करने लगेंगे।
4. नहीं कहना भी सीखें: हर बात के साथ सहमति जताने का एक मतलब है खुद को सीमित करना। कई बार सर्वश्रेष्ठ तक पहुंचने के लिए दूसरे अच्छे विकल्पों को भी ना कहना पड़ता है। घर-परिवार या कार्यस्थल पर काम करते हुए आपको अपनी प्राथमिकताएं हमेशा ध्यान रखनी चाहिए। ऐसे में यदि कोई बात ऐसी है, जो आपको पूरी तरह नामंजूर है या आपकी क्षमता से बाहर है, तो उसे अवश्य बताएं। अन्यथा हर चीज से तालमेल बना लेने के आपके स्वभाव का फायदा उठाने में लोगों को देर नहीं लगेगी। 
5. शिकायत करना बंद करें: आप अपनी समस्याओं से तब तक बाहर नहीं निकलेगी,जब तक आप उनके बारे में शिकायत करती रहेंगी। आप क्या चाहती हैं, इस पर अपनी ऊर्जा लगाएं, बजाय इसके कि आप क्या नहीं चाहतीं। इसी तरह आप क्या कर सकती हैं, इस पर ध्यान दें, यह नहीं कि आप क्या नहीं कर सकतीं। 
6. बड़ा सोचें: यदि आप ज्यादा बेहतर कर सकती हैं तो कम से समझौता क्यों करें। अपनी दूरदृष्टि को व्यापक बनाएं। ध्यान रखें कि यदि आप सोच सकती हैं तो आप उस काम को कर भी सकती हैं। सभी बड़े काम पहले मन से शुरू होते हैं। कभी-कभार अपने प्रियों की भी छोटी-छोटी बातें चुभ जाती हैं, पर उस समय तस्वीर के बड़े पक्ष को देखें। 
7. अनुकूलता से बाहर निकलें: अपने जीवन को दूसरों की राय के आधार पर न चलाएं। सुविधाओं से बाहर निकलने का साहस दिखाएं। आप क्या सोचती हैं, उसको अभिव्यक्त जरूर करें। तभी जो सोचती हैं, वह कर सकेंगी। 
8. आवाज उठाएं: जितना आप सहती हैं, उतना ही आपको सहने के लिए मजबूर किया जाता है। यदि ऐसा कुछ है, जो आप सच में कहना या करना चाहती हैं, तो अवश्य उन्हें बताएं, जो आपको समझते हैं। अपनी बात रखने से पीछे न हटें। निर्भय होकर अपनी बात कहना सीखें। 
9. खुद से हार न मानें: जितने मजबूत आपके इरादे होंगे, उतनी ही सफलता आपको मिलेगी। मुश्किल स्थितियां आपकी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं। जितना अधिक चुनौतियों का सामना करेंगी, उतना ही सबके सामने खुद को मजबूती से रख सकेंगी। ऐसे में शुरुआती संघर्षो से घबराएं नहीं। 
10. कदम उठाएं: जीवन में सफलता उसी को मिलती है, जो अपने तमाम डर और शंकाओं के बावजूद कदम उठाते हैं और विपरीत परिस्थितियों में निर्णय ले पाते हैं। जोखिम के बिना कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। अपने डर से आगे निकलने की कोशिश करें।
साभार हिंदुस्तान 15-09-2012
http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/lifestylenews/article1-Personality-development-50-50-262339.html

Tuesday, September 4, 2012

आधुनिकता के साये में कामकाजी पति-पत्नी

'दृश्य और अदृश्य जगत' ब्लॉग पर 
गीता झा

आधुनिकता के साये में उबाऊ दाम्पत्य जीवन

दांपत्य या गृहस्थ  -जीवन एक महत्पूर्ण संस्था है जिसमें नर-नारी के निर्मल सामीप्य का समर्थन होता है. कुछ एक अपवाद , विवशता या अति उच्च - स्तरीय आदर्शवादिता के तथ्यों को छोड़ दिया जाये तो दाम्पत्य जीवन सुयोग- संयोग से विकसित एक स्वाभाविक और सरल विकास क्रम - व्यवस्था  है.

उपभोत्ता संस्कृति और आधुनिकता ने न केवल व्यक्ति और समाज को ही प्रभावित किया हैं वरन पारिवारिक संस्था की जडें भी हिला कर रख दी हैं.

आधुनिक जीवन शैली , अत्यधिक महत्वकांक्षा और अपना -अपना करियर बनाने का लोभ अपनाते दम्पति , आपस में ज्यादा रूचि नहीं रखते हैं और मजबूरीवश उनका सम्बन्ध केवल एक छत्त के नीचे रहना मात्र ही होता है.

पति-पत्नी-एकल परिवार

पहले संयुक्त परिवार में सास- ससुर , चाचा -चाची, जेठ-जेठानी, ननद- नंदोई इत्यादि का दाम्पत्य -जीवन में काफी दखल रहता था.  पति-पत्नी के अहम टकराने के फलस्वरूप दाम्पत्य जीवन के बिखरने से पहले ही वे दखल दे देते थे और पति-पत्नी का निजी कलेश-कलह आगे नहीं बढ पाता था. अब संयुक्त परिवार विघटित होने लगे  हैं, दखल देने वाला कोई रह नहीं गया है .दूर के नाते-रिश्तेदार भी आत्मीयता के आभाव में प्रभावशाली दखल नहीं दे पाते है, इससे पति- पत्नी के अपने- अपने अहम और  स्वार्थ  की जबरदस्त भिडंत होती है और गृहस्थी  में दरार, टूटन और विघटन  के दर्शन होते हैं.



करियर सवांरने  के लोभ में मध्यम एकांकी -परिवार के पति-पत्नि अपने बच्चों को  नौकरों के हवाले , केयर-सेंटर, बालवाडी या प्री - नर्सरी  में छोड़ कर निश्चिंत हो जाते हैं. केवल नामी स्कूल में नाम लिखा कर, मोटी-मोटी फीस भर कर और अनेकों tuition और coaching  करा कर वे आपने अभिभावक होने के फ़र्ज़ की इतिश्री समझ लेते हैं. इन बच्चों को  पारिवारिक प्रेम-पोषण-सरंक्षण से वंचित रहने के कारण कई मनोविज्ञानिक और व्यक्तिगत समस्याओं  का सामना करना पड़ता है.

पति-पत्नी-करियर

अक्सर  कामकाज करने वाले पति या पत्नि में जो पहले घर आ जाता है, उसे दूसरे  के बाद में आने की कोई उमंग और अधीरता नहीं होती हैं. आधुनिकता की  दुहाई देने वाले पति भी  अकसर पुरातन -पंथी मानसिकता से ग्रसित पाए गए हैं  . पतियों  के अनुसार घर-गृहस्ती चलाना  स्त्रियों का ही कार्य हैं , क्योकि वे उसे संरक्षण  देतें हैं, काम  करने की आज़ादी देतें हैं, समाज  में सर उठा  कर चलने  का गर्व और अधिकार देते हैं , वर्ना अविवाहित महिलाएं या जिनके पति  नहीं होते हैं , उन्हें समाज़ जीने ही कहाँ देता हैं ?



ऐसे पतियों की दिली ख्वाइश होती हैं की अगर पत्नियाँ  उनसे पहले घर आ जाती हैं तो , मुस्करा कर उनका स्वागत करे, उनके कपडे निकाल कर दे, चाय-पानी-नास्ता हाजिर रखे और घर, आपने ऑफिस या बाल-बच्चों की शिकायतों का पोटला न लेकर बैठ जाये.
यहाँ पत्नियों का कहना हैं की वे भी तो घर थक कर आती हैं, उनका भी विश्राम करने का मूड होता हैं,  वैसे अगर पति पहले घर पर आ जाये तो कौन सा   मुस्करा के दरवाजे पर उनका स्वागत करता हैं या चाय-पानी पेश करता हैं ?
करियर  की बुलंदी को छूने की चाहत में अक्सर दम्पतियों में एक दूसरे को धोखा देने और अपने सहकर्मियों  से सम्बन्ध बनाने की प्रवृति धड़ल्ले से विकसित हुई हैं. वैवाहिक संबंधों से छुटकारा पाने की साध पाले हुए लोग अपनी करियर की सफलता के लिए अपने सहकर्मी या जिनसे करियर में उन्नति के अवसर मिलते हैं उनसे अन्तरंग सम्बन्ध बनाने से नहीं हिचकिचाते. यानि करियर के लिए दाम्पत्य-जीवन को दाव पर लगाने वालों की भी कमी नहीं है.

पति-पत्नी-सेक्स

कामकाजी दम्पति अक्सर शीघ्र ही सेक्स से विरक्त हो जाते हैं. बच्चों के जन्म के बाद या अधिकतर दिनभर की भाग दौड़ , विभिन्न प्रकार के तनाव, वातावरण के प्रदुषण और शारीरिक थकान के कारण पति-पत्नी एक दूसरे के लिए क्रमशः साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिका बनते जाते हैं.



अपने-अपने अहम , स्वार्थ और आकाँक्षाओं में तालमेल न बैठा पाने के कारन यौन -संबंधों में शिथिलता आती जाती हैं. केवल यौन -सुख पर आधारित दाम्पत्य - जीवन मानसिक और भावनात्मक जुड़ाव की कमी के कारण बोझिल और उबाऊ हो जाते हैं.

पति-पत्नी- विवाहत्तेर संबंध
आमतौर पर माना जाता हैं की यौन-सुख की तलाश में पति-पत्नी विवाहत्तेर सम्बन्ध बनातें हैं. लेकिन हकीकत यह हैं की अक्सर एक दूसरे से बेज़ार हुए  पति -पत्नी जब एक दूसरे की रिपोर्ट-कार्ड में परफोर्मेंस  - वइस,  पासिंग - मार्क्स भी नहीं देते हैं , तभी  वे व्यर्थ में अपने को ------तीसमारखां सिद्ध ----करने के चक्कर में  यहाँ-वहाँ मारे-मारे फिरते हैं.



अपने-अपने करियर को प्रमुखता देते हुए , साथ - साथ काम करने के कारण, लगाव, निर्भरता, अनुराग, और हँसी मजाक़ के कारण अक्सर दम्पति बाहर भावनात्मक सम्बन्ध बना लेते हैं जिसका उदेश्य सेक्स न होकर केवल अपने उबाऊ और कतराने वाले दाम्पत्य-जीवन से कुछ समय के लिए छुटकारा पाना होता है.


पति-पत्नी-सीक्रेट

आजकल दम्पति  पूरे जोर शोर से जतन- पूर्वक अपनी निजता को गोपनीय बना कर रखते हैं  और दूसरी ओर अपने पार्टनर की पूरी -पूरी जासूसी भी करते हैं. एक दूसरे के मोबाइल की कॉल  - डिटेल खंगालना, फ़ेस -बूक की अप - डेट - स्टेटस चेक करना ओर एक दूसरे के देनिक कार्यक्रमों ओर मूड -स्विंग पर पैनी दृष्टी रखना.  यानि दोहरे मापदंड के सभी फोर्मुले अपनाना.

वैवाहिक सम्बन्ध कामचलाऊ तरीके से चलता रहे इसलिए दंपत्ति अक्सर अपने ऑफिस या व्यवसाय की अधिकतर बातें या जानकारी एक दूसरे को नहीं बतातें हैं. उनके अनुसार अगर जरुरत से अधिक बताया गया तो दूसरे पक्ष की दखलंदाज़ी बढ सकती हैं, अपेक्षाएं ओर मांगें बढ सकती हैं और शक की सुई उनके चरित्र की और घूम सकती हैं. इसलिए सब कुछ बताना जरुरी नहीं होता है.

पति-पत्नी- अन्तरंग समय

ऑफिस से घर लौट कर सोते समय तक, छुट्टी के दिन, या एकांत के पलों में अधिकतर दम्पति एक दूसरे के साथ से बचने के लिए अपने लेप- टॉप या मोबाइल का इस्तमाल करना या टी. वी . के प्रोग्राम्स देखना अधिक पसंद करतें हैं.

अक्सर पत्नी के मायके जाने पर या पति के लम्बे टूर पर जाने पर दम्पति , स्वतंत्रता की सुखमय अनुभूति को बांटने के लिए  अपने - अपने कार्यस्थल पर जुलाब जामुन और समोसों  की  पार्टी देते  हैं.

पति-पत्नी- कुछ हमारे हड़प्पा युगीन विचार




लेकिन हकीकत यही है   की पति-पत्नी सर्वश्रेष्ठ   मित्र है , पति - पत्नी  आदर्श जीवनसाथी हैं और पति-पत्नी बेजोड़ प्रेमी भी हैं. जरुरत हैं थोडा संयम, त्याग, सेवा और प्रेम भावना की . नितांत वैक्तित्व  आपेक्षाओं और आवश्कताओं को सामंजस्य  , समर्पण और निष्ठा में बदलने की . शरीर , मन और भावना के तल पर  मिलाने से ही दम्पति  true soul -mate बन पाते हैं.

Dum dara dum dara मस्त  मस्त
Dara dum dara dum dara मस्त  मस्त
Dara dum dara  dum dum       
ओ  हमदम  बिन  तेरे  क्या  जीना 
ओ  हमदम  बिन  तेरे  क्या  जीना 

Thursday, August 2, 2012

घर के साथ बाहर का काम कर रहा है औरत को बीमार Women empowerment

सेवा क्षेत्र में घटती महिलाओं की भागीदारी
ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री 
महिलाओं की सेवा क्षेत्र में लगातार घट रही भागीदारी को देखते हुए योजना आयोग ने सरकार को यह सुझाव दिया है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान देश में सृजित होने वाली ढाई करोड़ नई नौकरियों में से आधी महिलाओं को मिलें। यह प्रस्ताव महिला सशक्तीकरण को नई दिशा दे सकता है। यूं तो ‘महिला सशक्तीकरण’ एक व्यापक अवधारणा है, पर उसका केंद्रबिंदु ‘निर्णय लेने की स्वतंत्रता’ है और यह तभी संभव है, जब महिलाएं आत्मनिर्भर हों। महिलाएं देश का महत्वपूर्ण मानव संसाधन हैं, इसलिए सामाजिक-आर्थिक विकास का अत्यंत महत्वपूर्ण निर्धारक तत्व भी हैं। चिंता का विषय यह है कि पिछले तीन दशकों में महिलाओं के वंचित रह जाने की समस्या को खत्म करने में सफलता नहीं मिली है। आम राय यह है कि आर्थिक मोर्चे पर भारतीय महिलाएं बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ रही हैं, परंतु आंकड़े इससे उलट कुछ और बयान कर रहे हैं। 2009-10 के एक सर्वे के मुताबिक, ‘कार्य’ में महिलाओं की भागीदारी की दर 2004-05 में 28.7 प्रतिशत थी, जो 2009-10 में घटकर 22.8 प्रतिशत रह गई। जब देश के चुनिंदा आला पदों पर आसीन महिलाएं फोर्ब्स पत्रिका में स्थान पा रही हैं, तो आर्थिक मोर्चे पर महिलाओं की भागीदारी घटना हैरत की बात है। दरअसल, भारतीय महिलाओं के लिए यह एक ऐसा संक्रमण काल है, जहां एक ओर उनके लिए आर्थिक स्वतंत्रता ने द्वार खोल रखे हैं, तो दूसरी ओर उनकी परंपरागत पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं, जिन्हें निभाने की सीख उन्हें बचपन से ही दी जाती है। यह जरूर है कि शहरी संस्कृति से ताल्लुक रखने वाले ऐसे मध्यवर्गीय परिवारों की तादाद में बढ़ोतरी हुई है, जिन्होंने अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए औरतों को बाहर जाकर काम करने की ‘इजाजत’ दी है। इसके बावजूद उन्हें परिवार के कार्यो से मुक्ति मिलती हो, ऐसा नहीं है। दूसरी ओर कार्यस्थल पर होने वाला लैंगिक भेदभाव, उनके प्रबंधन, नेतृत्व व कार्यक्षमताओं पर विश्वास न करने की मानसिकता, उन्हें उनके पुरुष सहकर्मियों की अपेक्षाकृत अधिक चुनौती देती है। यही दोहरा दबाव भारतीय महिलाओं  को ‘आर्थिक स्वतंत्रता’ की सोच को ही तिलांजलि देने के लिए प्रेरित करता है। ब्रिटेन में हुए एक सर्वे के मुताबिक, सुबह छह बजे बिस्तर छोड़ने के बाद से रात 11 बजे से पहले तक उन्हें एक पल की फुरसत नहीं होती। अनवरत काम से उनका शरीर बीमारियों का गढ़ बनने लगता है। यह स्थिति भारतीय संदर्भ में और गंभीर है, जहां पुरुष घरेलू कामकाज में सहयोग देना आज भी उचित नहीं समझते। क्या स्त्री की इससे मुक्ति संभव है? है, बशर्ते परिवार के पुरुष सदस्य उसे अपनी ही भांति इंसान मानना शुरू कर दें और घर की जिम्मेदारियों को निभाने में उसके वैसे ही सहयोगी बनें, जैसे परिवार की आर्थिक सुदृढ़ता के लिए स्त्री ने बाहर जाकर काम करना स्वीकारा है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
साभार दैनिक हिन्दुस्तान दिनांक 3 अगस्त 2012 पृष्ठ 12 
http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-247802.html

Tuesday, July 31, 2012

इंसानी दिमाग स्त्री और पुरुषों को अलग-अलग तरीके से देखता है. स्त्रियों का दिमाग भी यह भेदभाव करता है.

नज़र का फर्क 
यह शिकायत महिलाओं, बल्कि संवेदनशील पुरुषों की भी रही है कि समाज में स्त्री को एक वस्तु की तरह देखा जाता है, इंसान की तरह नहीं। मनोरंजन के साधन और व्यावसायिक हित महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किए जाने को बढ़ावा दे रहे हैं। स्त्री-पुरुष बराबरी हासिल करने के लिए जरूरी है कि स्त्रियों को सिर्फ एक वस्तु नहीं, एक इंसान की तरह सम्मान देना जरूरी है। लेकिन इसके लिए यह जानना जरूरी है कि इस दुराग्रह या पक्षपात की जड़ें कितनी गहरी हैं। द यूरोपियन जर्नल ऑफ सोशल साइकोलॉजी में एक शोध प्रकाशित हुआ है, जिसके मुताबिक इंसानी दिमाग स्त्री और पुरुषों को अलग-अलग तरीके से देखता है। वह पुरुषों को अलग नजरिये से देखता है और स्त्रियों को अलग। इसी वजह से स्त्रियों को यौन सुख का एक साधन मानने की प्रवृत्ति विकसित हुई है। शोध एक चौंकाने वाला निष्कर्ष भी देता है कि सिर्फ पुरुषों का ही नहीं, स्त्रियों का दिमाग भी यह भेदभाव करता है। जब हम किसी पुरुष को देखते हैं, तो हमारे दिमाग में जिस तरह की प्रक्रिया सक्रिय होती है, उसे ‘ग्लोबल’ या सार्वभौमिक संज्ञान प्रक्रिया कहते हैं। यह ऐसी प्रक्रिया होती है, जिसमें हम किसी व्यक्ति को उसकी संपूर्णता में देखते और पहचानते हैं। वहीं जब हम किसी स्त्री को देखते हैं, तो आम तौर पर हमारा दिमाग जिस प्रक्रिया का सहारा लेता है, उसे ‘लोकल’ या स्थानीय संज्ञान प्रक्रिया कहते हैं। इस प्रक्रिया से हम चीजों को, जैसे कार या मकान को देखते हैं। इसमें हम किसी चीज को कई हिस्सों के एक समुच्चय की तरह देखते हैं। यह देखा गया कि स्त्री और पुरुष, दोनों के दिमाग एक ही तरह से काम करते हैं, अर्थात स्त्रियां भी स्त्रियों को वस्तु की तरह ही देखती हैं। वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक प्रयोग किया। उन्होंने कुछ पुरुषों और स्त्रियों को कई स्त्री-पुरुषों की तस्वीरें दिखाईं। इसके बाद उन्हें तस्वीरों को फिर से दिखाया गया, इस वक्त मूल तस्वीर के साथ उसी तस्वीर को थोड़ा बदलाव करके दिखाया गया, जिसमें उनके किसी यौन सूचक अंग को ज्यादा स्पष्ट किया गया था। इसके बाद इन लोगों से पूछा गया कि उन्होंने पहले कौन-सी तस्वीर देखी थी? शोधकर्ताओं ने पाया कि ज्यादातर स्त्री-पुरुषों ने महिलाओं की तस्वीरों के बारे में ठीक-ठीक बता दिया, लेकिन पुरुषों की तस्वीरों के बारे में उतना ठीक नहीं बता पाए। इसका मतलब यह है कि पुरुषों के शारीरिक रूप में परिवर्तन पर वे ध्यान नहीं दे पाए, लेकिन स्त्रियों की तस्वीरों में उन्हें फर्क तुरंत समझ में आ गया। वैज्ञानिक यह मानते हैं कि हमारे दिमाग की यह प्रक्रिया जैविक वजहों से हो सकती है। प्रजनन और वंश-वृद्धि जीवों का बुनियादी संवेग है। चूंकि प्रजनन स्त्रियों से होता है, इसलिए आदिम युग से पुरुषों का दिमाग स्त्रियों को यौन और प्रजनन की दृष्टि से देखने का आदी हो गया है। हालांकि यह जरूर उलझाने वाला तथ्य है कि स्त्रियों के साथ ऐसा क्यों है। वैज्ञानिकों का कयास है कि शायद आदिम युग में स्पर्धा और तुलना की वजह से उनमें भी पुरुषों की तरह ही अन्य स्त्रियों को वस्तु की तरह देखने की आदत विकसित हो गई है। लेकिन अब मानव समाज बहुत विकसित हो गया है और उसे आबादी बढ़ाने वाले आदिम संवेगों की जरूरत नहीं है। अब तो समस्या आबादी पर नियंत्रण की है। सभ्यता और विज्ञान के विकास ने मानव जाति के लिए कई बुनियादी पैमाने बदल डाले हैं, इन्हीं में स्त्री-पुरुष के बीच गैरबराबरी का मसला भी है। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि चूंकि वे गैरबराबरी और स्त्रियों को ‘वस्तु’ मानने के जैविक आधार को कुछ हद तक जान पाए हैं, तो इससे इनके बीच की गैरबराबरी मिटाने में भी सहायता मिलेगी।  
संपादकीय दैनिक हिन्दुस्तान दिनांक 30 जुलाई 2012
Source : http://www.livehindustan.com/news/editorial/subeditorial/article1-story-57-116-246626.html